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अहमद वसी

1943 | मुंबई, भारत

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वो करे बात तो हर लफ़्ज़ से ख़ुश्बू आए

ऐसी बोली वही बोले जिसे उर्दू आए

लोग हैरत से मुझे देख रहे हैं ऐसे

मेरे चेहरे पे कोई नाम लिखा हो जैसे

मुद्दत गुज़र गई है कि दिल को सुकूँ नहीं

मुद्दत गुज़र गई है किसी का भला किए

जो चेहरे दूर से लगते हैं आदमी जैसे

वही क़रीब से पत्थर दिखाई देते हैं

यूँ जागने लगे तिरी यादों के सिलसिले

सूरज गली गली से निकलता दिखाई दे

फिर चाँदनी लगे तिरी परछाईं की तरह

फिर चाँद तेरी शक्ल में ढलता दिखाई दे

मुद्दत के बा'द आइना कल सामने पड़ा

देखी जो अपनी शक्ल तो चेहरा उतर गया

में साँस साँस हूँ घायल ये कौन मानेगा

बदन पे चोट का कोई निशान भी तो नहीं

झूट बोलों तो गुनहगार बनों

साफ़ कह दूँ तो सज़ा-वार बनों

थक के यूँ पिछले पहर सौ गया मेरा एहसास

रात भर शहर में आवारा फिरा हो जैसे

जुदाई क्यूँ दिलों को और भी नज़दीक लाती है

बिछड़ कर क्यूँ ज़ियादा प्यार का एहसास होता है

इन से ज़िंदा है ये एहसास कि ज़िंदा हूँ मैं

शहर में कुछ मिरे दुश्मन हैं बहुत अच्छा है

रोती आँखों को हँसाने का हुनर ले के चलो

घर से निकलो तो ये सामान-ए-सफ़र ले के चलो

अपनी ही ज़ात के सहरा में आज

लोग चुप-चाप जला करते हैं

तुम्हें तुम्हारे अलावा भी कुछ नज़र आए

गर अपने आइना-ख़ानों से तुम निकल आओ

जो कहता था ज़मीं को मैं सितारों से सजा दूँगा

वही बस्ती की तह में रख गया चिंगारियाँ अपनी

तुझ से समझौते की है शर्त यही दुनिया

जब इशारा मैं करूँ मेरी तरफ़ तू आए

बरताव इस तरह का रहे हर किसी के साथ

ख़ुद को लिए दिए भी रहो दोस्ती के साथ