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अहमक़ फफूँदवी

1895 - 1957 | इटावा, भारत

हास्य और व्यंग्य के शायर

हास्य और व्यंग्य के शायर

ये कह रही है इशारों में गर्दिश-ए-गर्दूं

कि जल्द हम कोई सख़्त इंक़लाब देखेंगे

जो अर्ज़ां है तो है उन की मता-ए-आबरू वर्ना

ज़रा सी चीज़ भी बेहद गिराँ है इस ज़माने में