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अख़्तर आसिफ़

1939 - 2008

अख़्तर आसिफ़

ग़ज़ल 2

 

अशआर 5

आइना सच बोलता है आइना है मो'तबर

सच की 'आदत डाल तू भी मो'तबर हो जाएगा

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आईना तो 'ऐबों की ख़बर देता है 'आसिफ़'

ख़ुश-फ़हमी-ए-इंसाँ का मगर कोई करे क्या

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जिस शख़्स को साए की है आज बड़ी चाहत

पूछो तो कभी उस ने पौदे भी लगाए हैं

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नहीं है मुझ को चमन से निकालना आसाँ

बशक्ल-ए-रंग रग-ए-गुल में बस गया हूँ मैं

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मैं जियूँ एहसाँ बिठा कर वो भी इक कम-ज़र्फ़ का

ज़िंदगी प्यारी है लेकिन इस क़दर प्यारी नहीं

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