अम्न इक़बाल के शेर
लोग हुस्न-ओ-अदा के क़ैदी हैं
और हम रेख़्ता के क़ैदी हैं
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देख कर तुझ को आज बरसी हैं
एक मुद्दत से ख़ुश्क थीं आँखें
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देखता रोज़ है वो मुझ को मगर जाने क्यों
चाँद से अपनी कोई बात नहीं होती है
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उन की ख़ुशबू से महकती हैं हज़ारों सदियाँ
फूल जो राह-ए-मोहब्बत में बिखर जाते हैं
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तेरे बस में है मो'तबर कर दे
मैं हूँ क़तरा मुझे गुहर कर दे
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वस्ल की राह निकालें तो निकल सकती है
हिज्र ही अपना मुक़द्दर हो ज़रूरी तो नहीं
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दु'आ करो कि कोई राह वस्ल की निकले
तमाम 'उम्र मुहाजिर नहीं रहेंगे हम
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दिल पे कोई मलाल क्या करना
चीज़ें होती हैं टूटने के लिए
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