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अंजुम इरफ़ानी

1937 | बलरामपुर, भारत

ग़ज़ल 13

नज़्म 1

 

शेर 23

चराग़ चाँद शफ़क़ शाम फूल झील सबा

चुराईं सब ने ही कुछ कुछ शबाहतें तेरी

सफ़र में हर क़दम रह रह के ये तकलीफ़ ही देते

बहर-सूरत हमें इन आबलों को फोड़ देना था

कोई पुराना ख़त कुछ भूली-बिसरी याद

ज़ख़्मों पर वो लम्हे मरहम होते हैं

ई-पुस्तक 1

Libas-e-Zakhm

 

1984

 

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