Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
Anwar Sadeed's Photo'

ख्यातिप्राप्त पाकिस्तानी आलोचक, शोधकर्ता, शायर और कॉलम लेखक; ‘उर्दू अदब की तहरिकें’ और ‘उर्दू अफ़साने में देहात की पेशकश’ के अलावा दर्जनों अहम किताबों के लेखक; कई महत्वपूर्ण समाचारपत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं को सम्पादकीय सहयोग दिया

ख्यातिप्राप्त पाकिस्तानी आलोचक, शोधकर्ता, शायर और कॉलम लेखक; ‘उर्दू अदब की तहरिकें’ और ‘उर्दू अफ़साने में देहात की पेशकश’ के अलावा दर्जनों अहम किताबों के लेखक; कई महत्वपूर्ण समाचारपत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं को सम्पादकीय सहयोग दिया

अनवर सदीद के शेर

1.4K
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

शिकवा किया ज़माने का तो उस ने ये कहा

जिस हाल में हो ज़िंदा रहो और ख़ुश रहो

ख़ाक हूँ लेकिन सरापा नूर है मेरा वजूद

इस ज़मीं पर चाँद सूरज का नुमाइंदा हूँ मैं

खुली ज़बान तो ज़र्फ़ उन का हो गया ज़ाहिर

हज़ार भेद छुपा रक्खे थे ख़मोशी में

जागती आँख से जो ख़्वाब था देखा 'अनवर'

उस की ताबीर मुझे दिल के जलाने से मिली

चला मैं जानिब-ए-मंज़िल तो ये हुआ मालूम

यक़ीं गुमान में गुम है गुमाँ है पोशीदा

कोई भी पेचीदगी हाएल नहीं अनवर-'सदीद'

ज़िंदगी है सामने मंज़र-ब-मंज़र और मैं

ज़मीं का रिज़्क़ हूँ लेकिन नज़र फ़लक पर है

कहो फ़लक से मिरे रास्ते से हट जाए

सैल-ए-ज़माँ में डूब गए मशहूर-ए-ज़माना लोग

वक़्त के मुंसिफ़ ने कब रक्खा क़ाएम उन का नाम

यूँ तसल्ली को तो इक याद भी काफ़ी थी मगर

दिल को तस्कीन तिरे लौट के आने से मिली

दुख के ताक़ पे शाम ढले

किस ने दिया जलाया था

तू जिस्म है तो मुझ से लिपट कर कलाम कर

ख़ुशबू है गर तो दिल में सिमट कर कलाम कर

कल शाम परिंदों को उड़ते हुए यूँ देखा

बे-आब समुंदर में जैसे हो रवाँ पानी

हम ने हर सम्त बिछा रक्खी हैं आँखें अपनी

जाने किस सम्त से जाए सवारी तेरी

पँख हिला कर शाम गई है इस आँगन से

अब उतरेगी रात अनोखी यादों वाली

उस के बग़ैर ज़िंदगी कितनी फ़ुज़ूल है

तस्वीर उस की दिल से जुदा कर के देखते

दम-ए-विसाल तिरी आँच इस तरह आई

कि जैसे आग सुलगने लगे गुलाबों में

घुप-अँधेरे में भी उस का जिस्म था चाँदी का शहर

चाँद जब निकला तो वो सोना नज़र आया मुझे

आशियानों में जब लौटे परिंदे तो 'सदीद'

दूर तक तकती रहीं शाख़ों में आँखें सुब्ह तक

जो फूल झड़ गए थे जो आँसू बिखर गए

ख़ाक-ए-चमन से उन का पता पूछता रहा

चश्मे की तरह फूटा और आप ही बह निकला

रखता भला मैं कब तक आँखों में निहाँ पानी

Recitation

Jashn-e-Rekhta | 8-9-10 December 2023 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate - New Delhi

GET YOUR PASS
बोलिए