Anwar Sadeed's Photo'

ख्यातिप्राप्त पाकिस्तानी आलोचक, शोधकर्ता, शायर और कॉलम लेखक; ‘उर्दू अदब की तहरिकें’ और ‘उर्दू अफ़साने में देहात की पेशकश’ के अलावा दर्जनों अहम किताबों के लेखक; कई महत्वपूर्ण समाचारपत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं को सम्पादकीय सहयोग दिया

ख्यातिप्राप्त पाकिस्तानी आलोचक, शोधकर्ता, शायर और कॉलम लेखक; ‘उर्दू अदब की तहरिकें’ और ‘उर्दू अफ़साने में देहात की पेशकश’ के अलावा दर्जनों अहम किताबों के लेखक; कई महत्वपूर्ण समाचारपत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं को सम्पादकीय सहयोग दिया

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खुली ज़बान तो ज़र्फ़ उन का हो गया ज़ाहिर

हज़ार भेद छुपा रक्खे थे ख़मोशी में

ख़ाक हूँ लेकिन सरापा नूर है मेरा वजूद

इस ज़मीं पर चाँद सूरज का नुमाइंदा हूँ मैं

जागती आँख से जो ख़्वाब था देखा 'अनवर'

उस की ताबीर मुझे दिल के जलाने से मिली

चला मैं जानिब-ए-मंज़िल तो ये हुआ मालूम

यक़ीं गुमान में गुम है गुमाँ है पोशीदा

यूँ तसल्ली को तो इक याद भी काफ़ी थी मगर

दिल को तस्कीन तिरे लौट के आने से मिली

ज़मीं का रिज़्क़ हूँ लेकिन नज़र फ़लक पर है

कहो फ़लक से मिरे रास्ते से हट जाए

शिकवा किया ज़माने का तो उस ने ये कहा

जिस हाल में हो ज़िंदा रहो और ख़ुश रहो

सैल-ए-ज़माँ में डूब गए मशहूर-ए-ज़माना लोग

वक़्त के मुंसिफ़ ने कब रक्खा क़ाएम उन का नाम

हम ने हर सम्त बिछा रक्खी हैं आँखें अपनी

जाने किस सम्त से जाए सवारी तेरी

कल शाम परिंदों को उड़ते हुए यूँ देखा

बे-आब समुंदर में जैसे हो रवाँ पानी

पँख हिला कर शाम गई है इस आँगन से

अब उतरेगी रात अनोखी यादों वाली

दुख के ताक़ पे शाम ढले

किस ने दिया जलाया था

तू जिस्म है तो मुझ से लिपट कर कलाम कर

ख़ुशबू है गर तो दिल में सिमट कर कलाम कर

उस के बग़ैर ज़िंदगी कितनी फ़ुज़ूल है

तस्वीर उस की दिल से जुदा कर के देखते

आशियानों में जब लौटे परिंदे तो 'सदीद'

दूर तक तकती रहीं शाख़ों में आँखें सुब्ह तक

घुप-अँधेरे में भी उस का जिस्म था चाँदी का शहर

चाँद जब निकला तो वो सोना नज़र आया मुझे

दम-ए-विसाल तिरी आँच इस तरह आई

कि जैसे आग सुलगने लगे गुलाबों में

जो फूल झड़ गए थे जो आँसू बिखर गए

ख़ाक-ए-चमन से उन का पता पूछता रहा

चश्मे की तरह फूटा और आप ही बह निकला

रखता भला मैं कब तक आँखों में निहाँ पानी

कोई भी पेचीदगी हाएल नहीं अनवर-'सदीद'

ज़िंदगी है सामने मंज़र-ब-मंज़र और मैं