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अनवर सिद्दीक़ी

1928

अनवर सिद्दीक़ी के शेर

डुबोए देता है ख़ुद-आगही का बार मुझे

मैं ढलता नश्शा हूँ मौज-ए-तरब उभार मुझे

सारी शफ़क़ समेट के सूरज चला गया

अब क्या रहा है मौज-ए-शब-ए-तार के सिवा

कितने सुबुक-दिल हुए तुझ से बिछड़ने के बाद

उन से भी मिलना पड़ा जिन से मोहब्बत थी

बिखर के टूट गए हम बिखरती दुनिया में

ख़ुद-आफ़रीनी का सौदा हमारे सर में था

उजालती नहीं अब मुझ को कोई तारीकी

सँवारता नहीं अब कोई हादसा मुझ को

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

बोलिए