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अक़ील शादाब

अक़ील शादाब के दोहा

इक काँटे से दूसरा मैं ने लिया निकाल

फूलों का इस देस में कैसा पड़ा अकाल

चादर मैली हो गई अब कैसे लौटाऊँ

अपने पिया के सामने जाते हुए शरमाऊँ

जैसे शब्द में अर्थ है जैसे आँख में नीर

ऐसे तुझ में बसा हुआ वो महफ़िल का मीर