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आसिफ़ बनारसी

1901 | ढाका, बंगलादेश

शेर 2

अभी आँखों ही को दे बज़्म में गर्दिश साक़ी

यही पैमाने छलकते रहें जाम आने तक

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दम भर के लिए होती है तस्कीन सी दिल को

आगे बढ़ा इस से असर अपनी दुआ का

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पुस्तकें 1

Sarguzasht-e-Asif

 

1983

 

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