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बाक़ी सिद्दीक़ी

1905 - 1972 | रावलपिंडी, पाकिस्तान

पाकिस्तान के प्रमुखतम आधुनिक शायरों में शामिल

पाकिस्तान के प्रमुखतम आधुनिक शायरों में शामिल

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तुम ज़माने की राह से आए

वर्ना सीधा था रास्ता दिल का

दोस्त हर ऐब छुपा लेते हैं

कोई दुश्मन भी तिरा है कि नहीं

कश्तियाँ टूट गई हैं सारी

अब लिए फिरता है दरिया हम को

राज़-ए-सर-बस्ता है महफ़िल तेरी

जो समझ लेगा वो तन्हा होगा

हर नए हादसे पे हैरानी

पहले होती थी अब नहीं होती

'बाक़ी' जो चुप रहोगे तो उट्ठेंगी उँगलियाँ

है बोलना भी रस्म-ए-जहाँ बोलते रहो

ज़िंदगी की बिसात पर 'बाक़ी'

मौत की एक चाल हैं हम लोग

एक पल में वहाँ से हम उट्ठे

बैठने में जहाँ ज़माने लगे

रहने दो कि अब तुम भी मुझे पढ़ सकोगे

बरसात में काग़ज़ की तरह भीग गया हूँ

तेरी हर बात पे चुप रहते हैं

हम सा पत्थर भी कोई क्या होगा

हो गए चुप हमें पागल कह कर

जब किसी ने भी समझा हम को

तुम भी उल्टी उल्टी बातें पूछते हो

हम भी कैसी कैसी क़समें खाते हैं

वक़्त के पास हैं कुछ तस्वीरें

कोई डूबा है कि उभरा देखो

दोस्ती ख़ून-ए-जिगर चाहती है

काम मुश्किल है तो रस्ता देखो

इस बदलते हुए ज़माने में

तेरे क़िस्से भी कुछ पुराने लगे

दिल को आने लगा बसने का ख़याल

आग जब घर को लगा दी हम ने

दिल में जब बात नहीं रह सकती

किसी पत्थर को सुना देते हैं

तुझ को देखा तिरे वादे देखे

ऊँची दीवार के लम्बे साए

यूँ भी होने का पता देते हैं

अपनी ज़ंजीर हिला देते हैं

हम कि शोला भी हैं और शबनम भी

तू ने किस रंग में देखा हम को

उन का या अपना तमाशा देखो

जो दिखाता है ज़माना देखो

हाए वो बातें जो कह सकते नहीं

और तन्हाई में दोहराते हैं हम

पहले हर बात पे हम सोचते थे

अब फ़क़त हाथ उठा देते हैं

कुछ पा कर भी मुतमइन हैं हम

इश्क़ में हाथ क्या ख़ज़ाने लगे

वक़्त का पत्थर भारी होता जाता है

हम मिट्टी की सूरत देते जाते हैं

यही रस्ता है अब यही मंज़िल

अब यहीं दिल किसी बहाने लगे

ख़ुद-फ़रेबी सी ख़ुद-फ़रेबी है

पास के ढोल भी सुहाने लगे

तेरे ग़म से तो सुकून मिलता है

अपने शोलों ने जलाया हम को

किस से पूछें कि वो अंदाज़-ए-नज़र

कब तबस्सुम हुआ कब तीर हुआ

एक दीवार उठाने के लिए

एक दीवार गिरा देते हैं

दिल की दीवार गिर गई शायद

अपनी आवाज़ कान में आई

कान पड़ती नहीं आवाज़ कोई

दिल में वो शोर बपा है अपना

दुनिया ने हर बात में क्या क्या रंग भरे

हम सादा औराक़ उलटते जाते हैं

बंद कलियों की अदा कहती है

बात करने के हैं सौ पैराए

हर याद हर ख़याल है लफ़्ज़ों का सिलसिला

ये महफ़िल-ए-नवा है यहाँ बोलते रहो