ग़ज़ल 18

शेर 20

ही जाते हो ख़्वाब में हर शब

तुम मिरा कितना ध्यान रखते हो

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नज़र उतारती हैं वक़्त वक़्त पर मेरी

मिली हैं माओं को बीनाइयाँ अजीब-ओ-ग़रीब

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ख़ुद पर किसी को हँसने का मौक़ा नहीं दिया

पूछा किसी ने हाल तो सिगरेट जला लिया

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मिरा घर जलाने वाले मुझे फ़िक्र है तिरी भी

कि हवा का रुख़ जो बदला तिरा घर भी जल जाए

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सुकून कितना था झोंपड़ी में

महल में कर पता चला है

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पुस्तकें 3

Mashaheer Ke Khutoot Doctor Mohammad Ateequr Rahman Ke Nam

 

2018

Mushaira

Apni Tarz Ka Pehla Munfarid Arabi Urdu Mushairah

 

Mushaira-e-Zinda Dilan

 

1994

 

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