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फ़हीम जोगापुरी

मऊनाथ भंजन, भारत

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वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से

वो और थे जो हार गए आसमान से

कितने तूफ़ानों से हम उलझे तुझे मालूम क्या

पेड़ के दुख-दर्द का फूलों से अंदाज़ा कर

शाम ख़ामोश है पेड़ों पे उजाला कम है

लौट आए हैं सभी एक परिंदा कम है

बात दिल की सुनूँ मैं दिल सुने मेरी

ये सर्द जंग है अपने ही इक मुशीर के साथ

रस्ते में 'फहीम' उस की तबीअत का बिगड़ना

घर जाने का इक और बहाना तो नहीं है

बंद कमरे में तिरा दर्द बुझ जाए कहीं

खिड़कियाँ खोल कि ये आग हवा चाहती है

जाएँगे एक रोज़ समुंदर की गोद में

दरिया के साथ रेत की तहरीर और हम

किसी के दर पे सज्दा करते करते

'फहीम' ऐसा हो सर टूट जाए

तेरी यादें हो गईं जैसे मुक़द्दस आयतें

चैन आता ही नहीं दिल को तिलावत के बग़ैर

तुम्हारी याद से ये रात कितनी रौशन है

नज़र में इतने हैं जुगनू कि हम गिनाएँ क्या

मिलन के ब'अद आती है जुदाई

नरक भी स्वर्ग से कितना निकट है

हम अहल-ए-ग़म को हक़ारत से देखने वालो

तुम्हारी नाव इन्हीं आँसुओं से चलती है

मरघट पथ पर देख के हम को जाने क्या क्या सोचें वो

आँखों से क्या पुन्य कमाए होंटों से क्या दान हुए