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फ़रियाद आज़र

1956 - - | दिल्ली, भारत

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अदा हुआ क़र्ज़ और वजूद ख़त्म हो गया

मैं ज़िंदगी का देते देते सूद ख़त्म हो गया

बंद हो जाता है कूज़े में कभी दरिया भी

और कभी क़तरा समुंदर में बदल जाता है

जो दूर रह के उड़ाता रहा मज़ाक़ मिरा

क़रीब आया तो रोया गले लगा के मुझे

इस तमाशे का सबब वर्ना कहाँ बाक़ी है

अब भी कुछ लोग हैं ज़िंदा कि जहाँ बाक़ी है

मैं उस की बातों में ग़म अपना भूल जाता मगर

वो शख़्स रोने लगा ख़ुद हँसा हँसा के मुझे

सुब्ह होती है तो दफ़्तर में बदल जाता है

ये मकाँ रात को फिर घर में बदल जाता है

ऐसी ख़ुशियाँ तो किताबों में मिलेंगी शायद

ख़त्म अब घर का तसव्वुर है मकाँ बाक़ी है

मैं अपनी रूह लिए दर-ब-दर भटकता रहा

बदन से दूर मुकम्मल वजूद था मेरा

मैं जिस में रह सका जी-हुज़ूरियों के सबब

ये आदमी है उसी कामयाब मौसम का

हम इब्तिदा ही में पहुँचे थे इंतिहा को कभी

अब इंतिहा में भी हैं इब्तिदा से लिपटे हुए