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फ़ज़ल हुसैन साबिर

1884 - 1962 | बुरहानपुर, भारत

ग़ज़ल 35

शेर 5

तू जफ़ाओं से जो बदनाम किए जाता है

याद आएगी तुझे मेरी वफ़ा मेरे बाद

तुम ने क्यूँ दिल में जगह दी है बुतों को 'साबिर'

तुम ने क्यूँ काबा को बुत-ख़ाना बना रक्खा है

शगुफ़्ता बाग़-ए-सुख़न है हमीं से 'साबिर'

जहाँ में मिस्ल-ए-नसीम-ए-बहार हम भी हैं

उन की मानिंद कोई साहब-ए-इदराक कहाँ

जो फ़रिश्ते नहीं समझे वो बशर समझे हैं

'साबिर' तेरा कलाम सुनें क्यूँ अहल-ए-फ़न

बंदिश अजब है और अजब बोल चाल है

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पुस्तकें 1

Kalam-e-Sabir

 

1985

 

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