ये दिल है मिरा या किसी कुटिया का दिया है

बुझता है दम-ए-सुब्ह तो जलता है सर-ए-शाम

सिमटा तिरा ख़याल तो गुल-रंग अश्क था

फैला तो मिस्ल-ए-दश्त-ए-वफ़ा फैलता गया