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हनीफ़ साजिद

ग़ज़ल 1

 

शेर 2

इंक़लाब-ए-सुब्ह की कुछ कम नहीं ये भी दलील

पत्थरों को दे रहे हैं आइने खुल कर जवाब

पत्थरों से कब तलक बाँधेगी उम्मीद-ए-वफ़ा

ज़िंदगी देखेगी कब तक जागती आँखों से ख़्वाब