पानी ने जिसे धूप की मिट्टी से बनाया

वो दाएरा-ए-रब्त बिगड़ने के लिए था

महफ़िल में फूल ख़ुशियों के जो बाँटता रहा

तन्हाई में मिला तो बहुत ही उदास था

रिश्ते नाते टूटे फूटे लगे हैं

जब भी अपना साया साथ नहीं होता

हर ज़ख़्म-ए-कोहना वक़्त के मरहम ने भर दिया

वो दर्द भी मिटा जो ख़ुशी की असास था

रेत पर जलते हुए देख सराबों के चराग़

अपने बिखराव में वो और सँवर जाता है

जिन का यक़ीन राह-ए-सुकूँ की असास है

वो भी गुमान-ए-दश्त में मुझ को फँसे लगे

बस्ती के हस्सास दिलों को चुभता है

सन्नाटा जब सारी रात नहीं होता