ग़ज़ल 11

शेर 15

तुम्हारी याद की शिद्दत में बहने वाला अश्क

ज़मीं में बो दिया जाए तो आँख उग आए

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अच्छा तिरी नज़र में बहुत मुख़्तलिफ़ हूँ मैं

यानी तिरी नज़र में कोई दूसरा भी है

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कामयाबी की दुआएँ मुझे देने वाले

मैं तिरे इश्क़ में नाकाम हुआ जाता हूँ

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फ़लक पे भीड़ लगी थी शिकस्ता आहों की

दुआ से पहले मुझे रास्ता बनाना पड़ा

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वो मुझ को देखने मेरे क़रीब आया है

ये धुँद सारे महीनों में क्यूँ नहीं पड़ती

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