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हुज़ूर आप कोई फ़ैसला करें तो सही

हैं सर झुके हुए दरबार भी लगा हुआ है

सुना है ख़्वाब मुकम्मल कभी नहीं होते

सुना है इश्क़ ख़ता है सो कर के देखते हैं

तअल्लुक़ की नई इक रस्म अब ईजाद करना है

उस को भूलना है और उस को याद करना है

गुज़र जाएगी सारी रात इस में

मिरा क़िस्सा कहानी से बड़ा है

बहुत ताख़ीर से पाया है ख़ुद को

मैं अपने सब्र का फल हो गई हूँ

बना कर एक घर दिल की ज़मीं पर उस की यादों का

कभी आबाद करना है कभी बर्बाद करना है

मिरे दिल के अकेले घर में 'राहत'

उदासी जाने कब से रह रही है

जहाँ इक शख़्स भी मिलता नहीं है चाहने से

वहाँ ये दिल हथेली पर ज़माना चाहता है

जो मंज़िल तक जा के और कहीं मुड़ जाए

तुम ऐसे रस्ते के दुख से ना-वाक़िफ़ हो

हम से इश्क़ का मफ़्हूम पूछो

ये लफ़्ज़ अपने मआनी से बड़ा है

वो इश्क़ को किस तरह समझ पाएगा जिस ने

सहरा से गले मिलते समुंदर नहीं देखा

ये किस की याद की बारिश में भीगता है बदन

ये कैसा फूल सर-ए-शाख़-ए-जाँ खिला हुआ है

ज़िक्र सुनती हूँ उजाले का बहुत

उस से कहना कि मिरे घर आए

वो मुझ को आज़माता ही रहा है ज़िंदगी भर

मगर ये दिल अब उस को आज़माना चाहता है

कभी कभी तो जुदा बे-सबब भी होते हैं

सदा ज़माने की तक़्सीर थोड़ी होती है

वो और थे कि जो ना-ख़ुश थे दो जहाँ ले कर

हमारे पास तो बस इक जहान था रहा

उसे भी ज़िंदगी करनी पड़ेगी 'मीर' जैसी

सुख़न से गर कोई रिश्ता निभाना चाहता है

ख़ुशी मेरी गवारा थी क़िस्मत को दुनिया को

सो मैं कुछ ग़म बरा-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब उठा लाई