हुमैरा राहत

ग़ज़ल 15

शेर 18

उसे भी ज़िंदगी करनी पड़ेगी 'मीर' जैसी

सुख़न से गर कोई रिश्ता निभाना चाहता है

कभी कभी तो जुदा बे-सबब भी होते हैं

सदा ज़माने की तक़्सीर थोड़ी होती है

ख़ुशी मेरी गवारा थी क़िस्मत को दुनिया को

सो मैं कुछ ग़म बरा-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब उठा लाई

जहाँ इक शख़्स भी मिलता नहीं है चाहने से

वहाँ ये दिल हथेली पर ज़माना चाहता है

ये किस की याद की बारिश में भीगता है बदन

ये कैसा फूल सर-ए-शाख़-ए-जाँ खिला हुआ है

पुस्तकें 1

Tahayyur-e-Ishq

 

2009

 

चित्र शायरी 3

जो बुझ गए थे चराग़ फिर से जला रहा है ये कौन दिल के किवाड़ फिर खटखटा रहा है मुहीब क़हतुर-रिजाल में भी ख़याल तेरा नए मनाज़िर नए शगूफ़े खिला रहा है वो गीत जिस में तिरी कहानी सिमट गई थी उसे नई तर्ज़ में कोई गुनगुना रहा है मैं वुसअतों से बिछड़ के तन्हा न जी सकूँगा मुझे न रोको मुझे समुंदर बुला रहा है वो जिस के दम से मैं उस की यादों से मुंसलिक हूँ उसे ये कहना वो घाव भी भरता जा रहा है

 

"कराची" के और शायर

  • ज़ीशान साहिल ज़ीशान साहिल
  • परवीन शाकिर परवीन शाकिर
  • आरज़ू लखनवी आरज़ू लखनवी
  • सलीम कौसर सलीम कौसर
  • मोहसिन एहसान मोहसिन एहसान
  • अज़रा अब्बास अज़रा अब्बास
  • उबैदुल्लाह अलीम उबैदुल्लाह अलीम
  • ज़ेहरा निगाह ज़ेहरा निगाह
  • सीमाब अकबराबादी सीमाब अकबराबादी
  • अदा जाफ़री अदा जाफ़री