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जलाल लखनवी

1832 - 1909 | लखनऊ, भारत

लखनऊ और रामपूर स्कूल के मिले-जुले रंग में शायरी के लिए माशूहर उत्तर- क्लासिकी शायर

लखनऊ और रामपूर स्कूल के मिले-जुले रंग में शायरी के लिए माशूहर उत्तर- क्लासिकी शायर

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इश्क़ की चोट का कुछ दिल पे असर हो तो सही

दर्द कम हो या ज़ियादा हो मगर हो तो सही

मैं ने पूछा कि है क्या शग़्ल तो हँस कर बोले

आज कल हम तेरे मरने की दुआ करते हैं

इक रात दिल-जलों को ये ऐश-विसाल दे

फिर चाहे आसमान जहन्नम में डाल दे

just one night give these deprived the joy of company

thereafter if you wish merge paradise and purgatory

जिस ने कुछ एहसाँ किया इक बोझ सर पर रख दिया

सर से तिनका क्या उतारा सर पे छप्पर रख दिया

anyone who did a favour placed a burden on my head

removed a straw from over me, and placed a mountain instead

हो बरहम जो बोसा बे-इजाज़त ले लिया मैं ने

चलो जाने दो बेताबी में ऐसा हो ही जाता है

'जलाल' अहद-ए-जवानी है दोगे दिल सौ बार

अभी की तौबा नहीं ए'तिबार के क़ाबिल

वा'दा क्यूँ बार बार करते हो

ख़ुद को बे-ए'तिबार करते हो

गई थी कह के मैं लाती हूँ ज़ुल्फ़-ए-यार की बू

फिरी तो बाद-ए-सबा का दिमाग़ भी मिला

ख़ौफ़-ए-आह बुतों को डर है नालों का

बड़ा कलेजा है इन दिल दुखाने वालों का

unafraid of soullful sighs, undaunted by the cries

these who break peoples hearts,

पहुँचे वहाँ तक ये दुआ माँग रहा हूँ

क़ासिद को उधर भेज के ध्यान आए है क्या क्या

मैं जो आया ग़ैर से हंस कर कहा उस ने 'जलाल'

ख़त्म है जिस पर शराफ़त वो कमीना गया