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जलील मानिकपूरी

1866 - 1946 | हैदराबाद, भारत

सबसे लोकप्रिय उत्तर क्लासिकी शायरों में प्रमुख/अमीर मीनाई के शार्गिद/दाग़ देहलवी के बाद हैदराबाद के राज-कवि

सबसे लोकप्रिय उत्तर क्लासिकी शायरों में प्रमुख/अमीर मीनाई के शार्गिद/दाग़ देहलवी के बाद हैदराबाद के राज-कवि

बात उल्टी वो समझते हैं जो कुछ कहता हूँ

बात उल्टी वो समझते हैं जो कुछ कहता हूँ

जब मैं चलूँ तो साया भी अपना न साथ दे

आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें

दिल कभी लाख ख़ुशामद पे भी राज़ी न हुआ

आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें

वो दिल ले के ख़ुश हैं मुझे ये ख़ुशी है

छुरी का तीर का तलवार का तो घाव भरा

आँख रहज़न नहीं तो फिर क्या है

ख़ुश हुआ ऐसा कि मैं आपे से बाहर हो गया

वो दिल ले के ख़ुश हैं मुझे ये ख़ुशी है

बात उल्टी वो समझते हैं जो कुछ कहता हूँ

जब मैं चलूँ तो साया भी अपना न साथ दे

बिखरी हुई वो ज़ुल्फ़ इशारों में कह गई

बिखरी हुई वो ज़ुल्फ़ इशारों में कह गई