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जावेद कमाल रामपुरी

1930 - 1978 | रामपुर, भारत

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फिर कई ज़ख़्म-ए-दिल महक उट्ठे

फिर किसी बेवफ़ा की याद आई

हाथ फिर बढ़ रहा है सू-ए-जाम

ज़िंदगी की उदासियों को सलाम

अब तो जाओ रस्म-ए-दुनिया की

मैं ने दीवार भी गिरा दी है

अगर सुकून से उम्र-ए-अज़ीज़ खोना हो

किसी की चाह में ख़ुद को तबाह कर लीजे

हाए वो लोग हम से रूठ गए

जिन को चाहा था ज़िंदगी की तरह

वही बे-वज्ह उदासी वही बे-नाम ख़लिश

राह-ओ-रस्म-ए-दिल-ए-नाकाम से जी डरता है

दिन के सीने में धड़कते हुए लम्हों की क़सम

शब की रफ़्तार-ए-सुबुक-गाम से जी डरता है

हम आगही को रोते हैं और आगही हमें

वारफ़्तगी-ए-शौक़ कहाँ ले चली हमें

आई थी चंद गाम उसी बे-वफ़ा के साथ

फिर उम्र भर को भूल गई ज़िंदगी हमें

दरवाज़ों के पहरे हैं दीवारों के संगीनें

होता जो मिरे बस में इस घर से निकल जाता