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जव्वाद शैख़

1985 | पुर्तगाल

ग़ज़ल 24

शेर 16

मैं अब किसी की भी उम्मीद तोड़ सकता हूँ

मुझे किसी पे भी अब कोई ए'तिबार नहीं

अपने सामान को बाँधे हुए इस सोच में हूँ

जो कहीं के नहीं रहते वो कहाँ जाते हैं

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क्या है जो हो गया हूँ मैं थोड़ा बहुत ख़राब

थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए

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टूटने पर कोई आए तो फिर ऐसा टूटे

कि जिसे देख के हर देखने वाला टूटे

लग रहा है ये नर्म लहजे से

फिर तुझे कोई मसअला हुआ है

पुस्तकें 1

Koi Koi Baat

 

2016

 

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