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कुमार पाशी

1935 - 1992 | दिल्ली, भारत

प्रतिष्ठित आधुनिक शायर, पत्रिका "सुतूर" के संपादक

प्रतिष्ठित आधुनिक शायर, पत्रिका "सुतूर" के संपादक

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कुछ ग़ज़लें उन ज़ुल्फ़ों पर हैं कुछ ग़ज़लें उन आँखों पर

जाने वाले दोस्त की अब इक यही निशानी बाक़ी है

कभी दिखा दे वो मंज़र जो मैं ने देखे नहीं

कभी तो नींद में ख़्वाब के फ़रिश्ते

कोई तो ढूँड के मुझ को कहीं से ले आए

कि ख़ुद को देखा नहीं है बहुत ज़मानों से

दश्त-ए-जुनूँ की ख़ाक उड़ाने वालों की हिम्मत देखो

टूट चुके हैं अंदर से लेकिन मन-मानी बाक़ी है

तेरी याद का हर मंज़र पस-मंज़र लिखता रहता हूँ

दिल को वरक़ बनाता हूँ और शब भर लिखता रहता हूँ

मिरी दहलीज़ पर चुपके से 'पाशी'

ये किस ने रख दी मेरी लाश ला कर

क्यूँ लोगों से मेहर-ओ-वफ़ा की आस लगाए बैठे हो

झूट के इस मकरूह नगर में लोगों का किरदार कहाँ

ओढ़ लिया है मैं ने लिबादा शीशे का

अब मुझ को किसी पत्थर से टकराने दो

अपने गिर्द-ओ-पेश का भी कुछ पता रख

दिल की दुनिया तो मगर सब से जुदा रख

हुई हैं दैर हरम में ये साज़िशें कैसी

धुआँ सा उठने लगा शहर के मकानों से

नई नई आवाज़ें उभरीं 'पाशी' और फिर डूब गईं

शहर-ए-सुख़न में लेकिन इक आवाज़ पुरानी बाक़ी है

हैं सारे इंकिशाफ़ अपने हैं सारे मुम्किनात अपने

हम इस दुनिया का सारा इल्म ले जाएँगे साथ अपने