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कुमार पाशी

1935 - 1992 | दिल्ली, भारत

प्रतिष्ठित आधुनिक शायर, पत्रिका "सुतूर" के संपादक

प्रतिष्ठित आधुनिक शायर, पत्रिका "सुतूर" के संपादक

ग़ज़ल 26

नज़्म 28

शेर 12

कभी दिखा दे वो मंज़र जो मैं ने देखे नहीं

कभी तो नींद में ख़्वाब के फ़रिश्ते

कोई तो ढूँड के मुझ को कहीं से ले आए

कि ख़ुद को देखा नहीं है बहुत ज़मानों से

दश्त-ए-जुनूँ की ख़ाक उड़ाने वालों की हिम्मत देखो

टूट चुके हैं अंदर से लेकिन मन-मानी बाक़ी है

ई-पुस्तक 27

1967 Ki Muntakhab Shairi

 

1968

1969 Ki Muntakhab Shairi

 

1970

1970 Ki Muntakhab Shayari

 

1971

Ardhangni Ke Naam

 

1987

चाँद चिराग़

 

1994

Dhoop Aur Samandar

Takhleeqi Afsanon Ka Intikhab

1899

Ek Mausam Mere Dil Ke Andar Ek Mausam Mere Bahar

 

1979

इक मौसम मिरे दिल के अंदर

इक मौसम मिरे दिल के बाहर

1979

इंतिज़ार की रात

 

1973

जुमलों की बुनियाद

 

1974

ऑडियो 22

अपने गिर्द-ओ-पेश का भी कुछ पता रख

एक कहानी ख़त्म हुई है एक कहानी बाक़ी है

तेरी याद का हर मंज़र पस-मंज़र लिखता रहता हूँ

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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