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jis ke hote hue hote the zamāne mere

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Lokesh Tripathi's Photo'

लोकेश त्रिपाठी

1980 | लखनऊ, भारत

लोकेश त्रिपाठी के शेर

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कमाने और गँवाने में बचा पाया हूँ बस इतना

हमारे घर पुराने दोस्त देखो अब भी आते हैं

सिर्फ़ शा'इर ही रहता है ज़िंदा

आदमी को तो मर ही जाना है

वो ज़िद करती है लेकिन फिर अचानक मान जाती है

मिरे चेहरे की रंगत से वो क़ीमत जान जाती है

ये शाम ढल रही थी कि आई ख़बर बुरी

पानी के इंतिज़ार में इक झील मर गई

हम से हमारे ख़्वाब भी जब दूर हो गए

मजबूर तब हुए यूँ कि मज़दूर हो गए

हम सभी आकाश में लटके हुए

सोचते हैं कि ज़मीं पे पाँव है

मिरा ही मन नहीं लगता है उस में

कि उस का मन भी मुझ से भर गया है

मर गई माँ तो बट गए ज़ेवर

बट गया घर पिता के मरते ही

चीज़ कोई नहीं दूसरी चाहिए

बात जिस की हुई थी वही चाहिए

रहा था मल मिरे चेहरे पे कालिख

वो शीशा साफ़ थोड़ी कर रहा था

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