मजाज़ आशना के शेर
न कोई ख़्वाब न ख़्वाहिश न कोई हंगामा
कई दिनों से है मौसम 'अजब उदासी का
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आसमानों की तमन्ना में ज़मीं के न रहे
ख़्वाब वो देखे थे हम ने कि कहीं के न रहे
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अभी तो मौत के ख़्वाबों के सिलसिले हैं मगर
हम एक रोज़ हक़ीक़त में मारे जाएँगे
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तिरे बयान की शोख़ी से मुझ को ख़दशा है
तिरे ख़याल की ताईद कर न जाऊँ मैं
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तस्ख़ीर-ए-काएनात में मसरूफ़ है मगर
इंसान के ज़वाल का मौसम है इन दिनों
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सब घूमते हैं दर्द की चादर लपेट कर
क्या दर्द है ये कौन सा मातम है इन दिनों
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इस बार तो महरूमी-ए-उम्मीद ग़ज़ब थी
ये भी न रहा याद कि किस शय की तलब थी
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फिर गिरे हैं मिरे एहसास पे पत्थर के गुलाब
फिर मिरे ज़ेहन से रिसने लगा ख़ुशबू का लहू
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टैग : एहसास
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बाक़ी नहीं रही किसी जज़्बे में रौशनी
रिश्तों का ए'तिबार ख़त-ए-दूद हो गई
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मैं अपना ज़ेहन अपनी नज़र बेचता रहा
काग़ज़ के ताजिरों में हुनर बेचता रहा
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उसी कजरवी की सज़ा मिली कि हमारी 'अज़्मतें छिन गईं
कभी सच को झूट बना दिया कभी 'ऐब को भी हुनर किया
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इतना दबा हुआ था ज़रूरत के बोझ से
मिट्टी के मोल ला'ल-ओ-गौहर बेचता रहा
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ज़िंदगी हो गई सूखे हुए पत्तों की तरह
अब हवाओं की है मर्ज़ी कि जिधर ले जाएँ
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तन्हाई की दीवार से लग कर तिरी आँखें
मश्कूक निगाहों से मुझे घूर रही हैं
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टैग : तन्हाई
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नश्शा-ए-शौक़-ए-सफ़र टूटा तो एहसास हुआ
जिस जगह का हमें होना था वहीं के न रहे
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