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मख़मूर जालंधरी

1915 - 1979 | जालंधर, भारत

ग़ज़ल 14

नज़्म 4

 

शेर 3

ये फ़ैज़-ए-इश्क़ था कि हुई हर ख़ता मुआफ़

वो ख़ुश हो सके तो ख़फ़ा भी हो सके

गो उम्र भर मिल सके आपस में एक बार

हम एक दूसरे से जुदा भी हो सके

मौजूदगी-ए-जन्नत-ओ-दोज़ख़ से है अयाँ

रहमत है एक बहर मगर बे-कराँ नहीं

 

पुस्तकें 29

Aabadi

 

1968

आरज़ू की कलियाँ

 

1938

Bap Aur Bete

 

 

Bhook

 

1951

Chamgadad

 

 

दीवाना है दीवाना

 

1966

दिल ही तो है

 

 

दो अावाज़ें

 

 

Ek Sawal

 

1959

गुरू गोबिन्द सिंह

 

1967

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