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ममनून निज़ामुद्दीन

? - 1844 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल

कब गुल है हवा-ख़्वाह सबा अपने चमन का

फ़सीह अकमल

कल वस्ल में भी नींद न आई तमाम शब

फ़सीह अकमल

कोई हमदर्द न हमदम न यगाना अपना

फ़सीह अकमल

गुमाँ न क्यूँकि करूँ तुझ पे दिल चुराने का

फ़सीह अकमल

जो बाद-ए-मर्ग भी दिल को रही कनार में जा

फ़सीह अकमल

झुकी निगह में है ढब पुर्सिश-ए-निहानी का

फ़सीह अकमल

तुझे कुछ याद है पहला वो आलम इश्क़-ए-पिन्हाँ का

फ़सीह अकमल

तुझे नक़्श-ए-हस्ती मिटाया तो देखा

फ़सीह अकमल

रखे है रंग कुछ साक़ी शराब-ए-नाब आतिश का

फ़सीह अकमल

रहे है रू-कश-ए-निश्तर हर आबला दिल का

फ़सीह अकमल

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI