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मनीश शुक्ला

1971 - | लखनऊ, भारत

अब अपना चेहरा बेगाना लगता है

हम को थी संजीदा रहने की आदत

अब तक जिस्म सुलगता है

कैसी थी बरसात पूछ

अव्वल आख़िर ही जब नहीं बस में

क्या करें दरमियान की बातें

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आख़िर हम को बे-ज़ारी तक ले आई

हर शय पर गिरवीदा रहने की आदत

उड़ानों ने किया था इस क़दर मायूस उन को

थके-हारे परिंदे जाल में ख़ुद फँस रहे थे

उसी ने राह दिखलाई जहाँ को

जो अपनी राह पर तन्हा गया था

काग़ज़ों पर मुफ़्लिसी के मोर्चे सर हो गए

और कहने के लिए हालात बेहतर हो गए

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कितने लोगों से मिलना-जुलना था

ख़ुद से मिलना भी अब मुहाल हुआ

कितनी उजलत में मिटा डाला गया

आग में सब कुछ जला डाला गया

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किसी के इश्क़ में बर्बाद होना

हमें आया नहीं फ़रहाद होना

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कोई ता'मीर की सूरत तो निकले

हमें मंज़ूर है बुनियाद होना

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गुफ़्तुगू का कोई तो मिलता सिरा

फिर उसे नाराज़ कर के देखते

चंद लकीरें तो इस दर्जा गहरी थीं

देखने वाला डूब गया तस्वीरों में

ज़माने से घबरा के सिमटे थे ख़ुद में

मगर अब तो ख़ुद से भी उकता रहे हैं

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ज़िंदगी देख ले नज़र भर के

हम हैं शामिल तिरे ख़राबों में

तुझे जब देखता हूँ तो ख़ुद अपनी याद आती है

मिरा अंदाज़ हँसने का कभी तेरे ही जैसा था

दिल का सारा दर्द भरा तस्वीरों में

एक मुसव्विर नक़्श हुआ तस्वीरों में

बताऊँ क्या तुम्हें हासिल सफ़र का

अधूरी दास्ताँ है और मैं हूँ

बात करने का हसीं तौर-तरीक़ा सीखा

हम ने उर्दू के बहाने से सलीक़ा सीखा

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मैं था जब कारवाँ के साथ तो गुलज़ार थी दुनिया

मगर तन्हा हुआ तो हर तरफ़ सहरा ही सहरा था

मिरे दिल में कोई मासूम बच्चा

किसी से आज तक रूठा हुआ है

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मिरी आवारगी ही मेरे होने की अलामत है

मुझे फिर इस सफ़र के ब'अद भी कोई सफ़र देना

लुत्फ़ तो देती है ये आवारगी

फिर भी हम को लौट जाना चाहिए

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वक़्त कहाँ मुट्ठी में आने वाला था

लेकिन हम ने बाँध लिया तस्वीरों में

सुना है रात पूरे चाँद की है

समुंदर शाम से बहका हुआ है

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सफ़र में अब मुसलसल ज़लज़ले हैं

वो रुक जाएँ जिन्हें गिरने का डर है

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सीधे अपनी बात पे

ये लहजा दरबारी छोड़

हम चराग़ों की मदद करते रहे

और उधर सूरज बुझा डाला गया

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हम ने तो पास-ए-अदब में बंदा-परवर कह दिया

और वो समझे कि सच में बंदा-परवर हो गए

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