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मंज़र भोपाली

1959 | भोपाल, भारत

मंज़र भोपाली के शेर

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कह दो 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' से हम भी शे'र कहते हैं

वो सदी तुम्हारी थी ये सदी हमारी है

ये किरदारों के गंदे आइने अपने ही घर रखिए

यहाँ पर कौन कितना पारसा है हम समझते हैं

इन आँसुओं का कोई क़द्र-दान मिल जाए

कि हम भी 'मीर' का दीवान ले के आए हैं

जो पारसा हो तो क्यूँ इम्तिहाँ से डरते हो

हम ए'तिबार का मीज़ान ले के आए हैं

उन्हीं पे सारे मसाइब का बोझ रक्खा है

जो तेरे शहर में ईमान ले के आए हैं

इक मकाँ और बुलंदी पे बनाने दिया

हम को पर्वाज़ का मौक़ा ही हवा ने दिया

बाप बोझ ढोता था क्या जहेज़ दे पाता

इस लिए वो शहज़ादी आज तक कुँवारी है

इधर तो दर्द का प्याला छलकने वाला है

मगर वो कहते हैं ये दास्तान कुछ कम है

आँधियाँ ज़ोर दिखाएँ भी तो क्या होता है

गुल खिलाने का हुनर बाद-ए-सबा जानती है

आप ही की है अदालत आप ही मुंसिफ़ भी हैं

ये तो कहिए आप के ऐब-ओ-हुनर देखेगा कौन

कमानों में खिंचे हैं तीर तलवारें हैं चमकी

ज़रा ठहरो कहाँ जाते हो दरिया देखने को

सफ़र के बीच ये कैसा बदल गया मौसम

कि फिर किसी ने किसी की तरफ़ नहीं देखा

आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई

ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई

दिन भी डूबा कि नहीं ये मुझे मालूम नहीं

जिस जगह बुझ गए आँखों के दिए रात हुई

कोई तख़्लीक़ हो ख़ून-ए-जिगर से जन्म लेती है

कहानी लिख नहीं सकते कहानी माँगने वाले

ख़ुद को पोशीदा रक्खो बंद कलियों की तरह

फूल कहते हैं तुम्हें सब लोग तो महका करो

हमारे दिल पे जो ज़ख़्मों का बाब लिक्खा है

इसी में वक़्त का सारा हिसाब लिक्खा है

ये अश्क तेरे मिरे राएगाँ जाएँगे

उन्हीं चराग़ों से रौशन मोहब्बतें होंगी

अब समझ लेते हैं मीठे लफ़्ज़ की कड़वाहटें

हो गया है ज़िंदगी का तजरबा थोड़ा बहुत

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