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मसरूर जालंधरी

1929

मसरूर जालंधरी

अशआर 5

जो भी चाहो निकाल लो मतलब

ख़ामुशी गुफ़्तुगू पे भारी है

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क्यूँ हम को सुनाते हो जहन्नम के फ़साने

इस दौर में जीने की सज़ा कम तो नहीं है

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हमारी आँखों में बे-वज्ह गए आँसू

यक़ीन कीजे किसी बात पर नहीं आए

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इक उम्र की मेहनत का ये फल पाएँगे हम लोग

मिट्टी की रिदा ओढ़ के सो जाएँगे हम लोग

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शायद जाए किसी वक़्त लब-ए-बाम वो चाँद

शाम से सुबह तलक बंद दरीचा किया

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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