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मसरूर जालंधरी

1929

मसरूर जालंधरी के शेर

जो भी चाहो निकाल लो मतलब

ख़ामुशी गुफ़्तुगू पे भारी है

क्यूँ हम को सुनाते हो जहन्नम के फ़साने

इस दौर में जीने की सज़ा कम तो नहीं है

इक उम्र की मेहनत का ये फल पाएँगे हम लोग

मिट्टी की रिदा ओढ़ के सो जाएँगे हम लोग

हमारी आँखों में बे-वज्ह गए आँसू

यक़ीन कीजे किसी बात पर नहीं आए

शायद जाए किसी वक़्त लब-ए-बाम वो चाँद

शाम से सुबह तलक बंद दरीचा किया

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

Jashn-e-Rekhta | 2-3-4 December 2022 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate, New Delhi

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