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मीर अहमद नवेद

1955 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 11

शेर 13

मैं अपने हिज्र में था मुब्तला अज़ल से मगर

तिरे विसाल ने मुझ से मिला दिया है मुझे

ख़लिश बोल क्या यही है ख़ुदा

ये जो दिल में ख़ला सा रहता है

कुछ इस तरह से कहा मुझ से बैठने के लिए

कि जैसे बज़्म से उस ने उठा दिया है मुझे

ज़ख़्म-ए-तलाश में है निहाँ मरहम-ए-दलील

तू अपना दिल हार मोहब्बत बहाल रख

दबा सका सदा उस की तेरी बज़्म का शोर

ख़मोश रह के भी कोई सदा बना हुआ है

पुस्तकें 1

Mushaf