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नज़ीर बाक़री

संभल, भारत

ग़ज़ल 10

शेर 12

मैं एक ज़र्रा बुलंदी को छूने निकला था

हवा ने थम के ज़मीं पर गिरा दिया मुझ को

मैं ने दुनिया छोड़ दी लेकिन मिरा मुर्दा बदन

एक उलझन की तरह क़ातिल की नज़रों में रहा

गया याद उन्हें अपने किसी ग़म का हिसाब

हँसने वालों ने मिरे अश्क जो गिन के देखे

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