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नज़ीर बाक़री

संभल, भारत

नज़ीर बाक़री

ग़ज़ल 10

शेर 12

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए

सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को

इस लिए चल सका कोई भी ख़ंजर मुझ पर

मेरी शह-रग पे मिरी माँ की दुआ रक्खी थी

ज़ख़्म कितने तिरी चाहत से मिले हैं मुझ को

सोचता हूँ कि कहूँ तुझ से मगर जाने दे

अपनी आँखों के समुंदर में उतर जाने दे

तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे

किसी ने हाथ बढ़ाया है दोस्ती के लिए

फिर एक बार ख़ुदा ए'तिबार दे मुझ को

चित्र शायरी 3

अपनी आँखों के समुंदर में उतर जाने दे तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे ज़ख़्म कितने तिरी चाहत से मिले हैं मुझ को सोचता हूँ कि कहूँ तुझ से मगर जाने दे आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी कोई आँसू मिरे दामन पे बिखर जाने दे साथ चलना है तो फिर छोड़ दे सारी दुनिया चल न पाए तो मुझे लौट के घर जाने दे ज़िंदगी मैं ने इसे कैसे पिरोया था न सोच हार टूटा है तो मोती भी बिखर जाने दे इन अँधेरों से ही सूरज कभी निकलेगा 'नज़ीर' रात के साए ज़रा और निखर जाने दे

 

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