इश्क़ था और अक़ीदत से मिला करते थे

पहले हम लोग मोहब्बत से मिला करते थे

तमाम शहर गिरफ़्तार है अज़िय्यत में

किसे कहूँ मिरे अहबाब की ख़बर रक्खे

यानी कोई कमी नहीं मुझ में

यानी मुझ में कमी उसी की है

तुम्हारे साथ कई रंज बाँटने हैं हमें

सो एक दिन के लिए ज़िंदगी से फ़ुर्सत लो

मिरी जगह पे कोई और हो तो चीख़ उट्ठे

मैं अपने आप से इतने सवाल करता हूँ

खींच लाई है तिरे दश्त की वहशत वर्ना

कितने दरिया ही मिरी प्यास बुझाने आते

दश्त की प्यास किसी तौर बुझाई जाती

कोई तस्वीर ही पानी की दिखाई जाती

या उन्हें आती नहीं बज़्म-ए-सुख़न-आराई

या हमें बज़्म के आदाब नहीं आते हैं