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रम्ज़ी असीम

1975 | मुल्तान, पाकिस्तान

ग़ज़ल 11

शेर 8

मिरी जगह पे कोई और हो तो चीख़ उट्ठे

मैं अपने आप से इतने सवाल करता हूँ

यानी कोई कमी नहीं मुझ में

यानी मुझ में कमी उसी की है

इश्क़ था और अक़ीदत से मिला करते थे

पहले हम लोग मोहब्बत से मिला करते थे

चित्र शायरी 3

इश्क़ था और अक़ीदत से मिला करते थे पहले हम लोग मोहब्बत से मिला करते थे रोज़ ही साए बुलाते थे हमें अपनी तरफ़ रोज़ हम धूप की शिद्दत से मिला करते थे सिर्फ़ रस्ता ही नहीं देख के ख़ुश होता था दर-ओ-दीवार भी हसरत से मिला करते थे अब तो मिलने के लिए वक़्त नहीं मिलता है वर्ना हम कितनी सुहुलत से मिला करते थे

 

ऑडियो 10

इश्क़ था और अक़ीदत से मिला करते थे

कुछ अपनी फ़िक्र न अपना ख़याल करता हूँ

ज़ख़्म इस ज़ख़्म पे तहरीर किया जाएगा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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