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शाैकत वास्ती

1922 - 2009 | मुल्तान, पाकिस्तान

शाैकत वास्ती

ग़ज़ल 60

अशआर 5

अजीब बात है दिन भर के एहतिमाम के बा'द

चराग़ एक भी रौशन हुआ शाम के बा'द

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'शौकत' हमारे साथ बड़ा हादिसा हुआ

हम रह गए हमारा ज़माना चला गया

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बड़े वसूक़ से दुनिया फ़रेब देती रही

बड़े ख़ुलूस से हम ए'तिबार करते रहे

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रविश रविश पे चमन के बुझे बुझे मंज़र

ये कह रहे हैं यहाँ से बहार गुज़री है

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मुझे तो रंज क़बा-हा-ए-तार-तार का है

ख़िज़ाँ से बढ़ के गुलों पर सितम बहार का है

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पुस्तकें 10

 

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