ग़ज़ल 13

शेर 8

सूरज लिहाफ़ ओढ़ के सोया तमाम रात

सर्दी से इक परिंदा दरीचे में मर गया

न-जाने कौन सी मजबूरियाँ हैं जिन के लिए

ख़ुद अपनी ज़ात से इंकार करना पड़ता है

यक़ीन बरसों का इम्कान कुछ दिनों का हूँ

मैं तेरे शहर में मेहमान कुछ दिनों का हूँ

मैं उसे सुब्ह जानूँ जो तिरे संग नहीं

मैं उसे शाम मानूँ कि जो तेरे बिन है

मैं पूछ लेता हूँ यारों से रत-जगों का सबब

मगर वो मुझ से मिरे ख़्वाब पूछ लेते हैं

  • शेयर कीजिए

"मुल्तान" के और शायर

  • ग़ुलाम हुसैन साजिद ग़ुलाम हुसैन साजिद
  • मोहसिन नक़वी मोहसिन नक़वी
  • क़मर रज़ा शहज़ाद क़मर रज़ा शहज़ाद
  • अनवार अंजुम अनवार अंजुम
  • ज़ियाउल मुस्तफ़ा तुर्क ज़ियाउल मुस्तफ़ा तुर्क
  • वक़ार ख़ान वक़ार ख़ान
  • हिना अंबरीन हिना अंबरीन
  • मुबश्शिर सईद मुबश्शिर सईद
  • अरशद अब्बास ज़की अरशद अब्बास ज़की
  • आबिद मलिक आबिद मलिक