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रासिख़ अज़ीमाबादी

1757 - 1823 | पटना, भारत

शागिर्द हैं हम 'मीर' से उस्ताद के 'रासिख़'

उस्तादों का उस्ताद है उस्ताद हमारा

जब तुझे ख़ुद आप से बेगानगी हो जाएगी

आश्ना तब तुझ से वो देर-आश्ना हो जाएगा

बाज़ार जहाँ में कोई ख़्वाहाँ नहीं तेरा

ले जाएँ कहाँ अब तुझे जिंस-ए-वफ़ा हम