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साबिर आफ़ाक़

1982 | जलगाँव, भारत

साबिर आफ़ाक़ के शेर

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मौत जाए वबा में ये अलग बात मगर

हम तिरे हिज्र में नाग़ा तो नहीं कर सकते

मुझ को लगता है घड़ी जिस ने बनाई होगी

इंतिज़ार उस को भी शिद्दत से किसी का होगा

अना का सिर्फ़ मोहब्बत इलाज है 'आफ़ाक़'

तू नोक वाले मुसल्लस को दाएरे में मिला

एक सूरा-फ़ातिहा और चार क़ुल पढ़ दीजिए

जो था प्यारा उस की बरसी है गुज़ारिश दोस्तो

हल निकल आएँगे मसाइल के

ख़ुद-कुशी करने वालो बात करो

मिल नहीं सकता जो मैं ने खो दिया

मौत का कोई भी मुतबादिल नहीं

वस्ल को माँ के तरसते हैं मिरे बच्चे भी

कैफ़ियत हिज्र की मुझ पर ही नहीं तारी है

अंधेरे का तसव्वुर क्या है बोलूँ

अंधेरा रौशनी से चल रहा है

पूछ उस शख़्स से मैं जिस को नहीं मिल पाया

मैं तुझे जितना मयस्सर हूँ तिरी क़िस्मत है

बहुत ही ख़ुश्की में गुज़री है इस बरस होली

गिला है तुझ से कि गीला नहीं किया मुझ को