ये उम्र भर का सफ़र है इसी सहारे पर

कि वो खड़ा है अभी दूसरे किनारे पर

ख़्वाब तुम्हारे आते हैं

नींद उड़ा ले जाते हैं

जाने किस की आस लगी है जाने किस को आना है

कोई रेल की सीटी सुन कर सोते से उठ जाता है

देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है

दरिया उस को रस्ता दे कर आज तलक पछताता है

कैसा झूटा सहारा है ये दुख से आँख चुराने का

कोई किसी का हाल सुना कर अपना-आप छुपाता है

देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है

दरिया उस को रस्ता दे कर आज तलक पछताता है

पहला पत्थर याद हमेशा रहता है

दुख से दिल आबाद हमेशा रहता है