ग़ज़ल 24

शेर 7

ये उम्र भर का सफ़र है इसी सहारे पर

कि वो खड़ा है अभी दूसरे किनारे पर

ख़्वाब तुम्हारे आते हैं

नींद उड़ा ले जाते हैं

जाने किस की आस लगी है जाने किस को आना है

कोई रेल की सीटी सुन कर सोते से उठ जाता है

देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है

दरिया उस को रस्ता दे कर आज तलक पछताता है

देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है

दरिया उस को रस्ता दे कर आज तलक पछताता है

पुस्तकें 1

Darya

 

1999

 

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