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साबिर वसीम

कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 24

शेर 7

ये उम्र भर का सफ़र है इसी सहारे पर

कि वो खड़ा है अभी दूसरे किनारे पर

ख़्वाब तुम्हारे आते हैं

नींद उड़ा ले जाते हैं

कैसा झूटा सहारा है ये दुख से आँख चुराने का

कोई किसी का हाल सुना कर अपना-आप छुपाता है

पुस्तकें 1

Darya

 

1999

 

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