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सालिक लखनवी

1913 - 2013 | कोलकाता, भारत

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जो तेरी बज़्म से उट्ठा वो इस तरह उट्ठा

किसी की आँख में आँसू किसी के दामन में

ये भी इक रात कट ही जाएगी

सुब्ह-ए-फ़र्दा की मुंतज़िर है निगाह

अपनी ख़ुद्दारी सलामत दिल का आलम कुछ सही

जिस जगह से उठ चुके हैं उस जगह फिर जाएँ क्या

मय-ख़ाना-ए-हस्ती में साक़ी हम दोनों ही मुजरिम हैं शायद

ख़ुम तू ने बचा के रक्खे थे पैमाने मैं ने तोड़े हैं

चाहा था ठोकरों में गुज़र जाए ज़िंदगी

लोगों ने संग-ए-राह समझ कर हटा दिया

यूँही इंसानों के शहरों में मिला अपना वजूद

किसी वीराने में इक फूल खिला हो जैसे

कही किसी से रूदाद-ए-ज़िंदगी मैं ने

गुज़ार देने की शय थी गुज़ार दी मैं ने

नाख़ुदा डूबने वालों की तरफ़ मुड़ के देख

करेंगे किनारों की तमन्ना की है

बहार-ए-गुलिस्ताँ हम को पहचाने तअज्जुब है

गुलों के रुख़ पे छिड़का है बहुत ख़ून-ए-जिगर हम ने

निगाह-ए-मेहर कहाँ की वो बरहमी भी गई

मैं दोस्ती को जो रोया तो दुश्मनी भी गई

साहिल पे क़ैद लाखों सफ़ीनों के वास्ते

मेरी शिकस्ता नाव है तूफ़ाँ लिए हुए

सितारे की तरह सीने में दिल डूबा किया लेकिन

शब-ए-ग़म के अँधेरे से नहीं माँगी सहर हम ने

खींच भी लीजिए अच्छा तो है तस्वीर-ए-जुनूँ

आप की बज़्म में क्या जानिए कल हों कि हों

महव यूँ हो गए अल्फ़ाज़-ए-दुआ वक़्त-ए-दुआ

हाथ से ज़र्फ़-ए-तलब छूट गया हो जैसे

मिट चुके जो भी थे तौबा-शिकनी के अस्बाब

अब मय-ख़ाना पैमाना शीशा सुबू

आज भी है वही मक़ाम आज भी लब पे उन का नाम

मंज़िल-ए-बे-शुमार-गाम अपने सफ़र को क्या करूँ

दिल ने सीने में कुछ क़रार लिया

जब तुझे ख़ूब सा पुकार लिया

निगाह-ए-शौक़ से लाखों बना डाले हैं दर हम ने

क़फ़स में भी नहीं मानी शिकस्त-ए-बाल-ओ-पर हम ने

धुआँ देता है दामान-ए-मोहब्बत

इन आँखों से कोई आँसू गिरा है

माल-ओ-ज़र अहल-ए-दुवल सामने यूँ गिनते हैं

हम फ़क़ीरों ने कुछ सर्फ़ किया हो जैसे

मंज़िल मिली कश्मकश-ए-अहल-ए-नज़र में

इस भीड़ से मैं अपनी नज़र ले के चला हूँ

नज़र से देख तो साक़ी इक आईना बनाया है

शिकस्ता शीशा-ओ-साग़र के टुकड़े जोड़ कर हम ने

ज़िंदाँ में आचानक है ये क्या शोर-ए-सलासिल

ये 'सालिक'-ए-बेबाक का मातम तो नहीं है