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सिद्दीक़ मुजीबी

1931 - 2014 | रांची, भारत

ग़ज़ल 27

शेर 8

मैं वो टूटा हुआ तारा जिसे महफ़िल रास आई

मैं वो शोला जो शब भर आँख के पानी में रहता है

इक लहू की बूँद थी लेकिन कई आँखों में थी

एक हर्फ़-ए-मो'तबर था और कई मानों में था

नाख़ुदा हो कि ख़ुदा देखते रह जाते हैं

कश्तियाँ डूबती हैं उस के मकीं डूबते हैं

ई-पुस्तक 1

सरमाया-ए-ग़ज़ल

 

2014

 

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