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सिद्दीक़ मुजीबी

1931 - 2014 | रांची, भारत

ग़ज़ल 27

शेर 8

उठे हैं हाथ तो अपने करम की लाज बचा

वगरना मेरी दुआ क्या मिरी तलब क्या है

ख़ुद पे क्या बीत गई इतने दिनों में तुझ बिन

ये भी हिम्मत नहीं अब झाँक के अंदर देखूँ

एक बेचैन समुंदर है मिरे जिस्म में क़ैद

टूट जाए जो ये दीवार तो मंज़र देखूँ

ई-पुस्तक 1

सरमाया-ए-ग़ज़ल

 

2014

 

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