सुल्तान शाफ़ी के शेर
इक सम्त घर के लोग हैं इक सम्त 'इश्क़ है
ऐ नौजवान लड़की हिमाक़त की बात है
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ज़िंदगी एक फ़िल्म है मेरी
जिस में हँसने का सीन है ही नहीं
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वहशत ने मुझ हसीन को बेहाल कर दिया
कमज़ोर दिल के लोग न देखें मिरी तरफ़
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हालाँकि एक शख़्स तुम्हारी जगह पे है
लेकिन तुम्हारा इस से ख़ला भर नहीं रहा
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हमारी आँख के आँसू समेटो
तुम्हारा इस से ख़र्चा चल रहा है
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पूछ मुझ से कि किस तरह मैं ने
तेरी तस्वीर पे गुज़ारा किया
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मैं तेरे होते हुए ग़ैर की पनाह में हूँ
मिरे हबीब ये तुझ पर 'अज़ाब है शायद
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भले वो लड़की क़रीब आ कर खड़ी रहेगी
हमारे चेहरे की ये उदासी बनी रहेगी
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