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ताबिश मेहदी

1951 | दिल्ली, भारत

नैतिक मूल्यों पर ज़ोर देने वाले लोकप्रिय शायर

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ताबिश मेहदी के शेर

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अजनबी रास्तों पर भटकते रहे

आरज़ूओं का इक क़ाफ़िला और मैं

तकोगे राह सहारों की तुम मियाँ कब तक

क़दम उठाओ कि तक़दीर इंतिज़ार में है

अगर फूलों की ख़्वाहिश है तो सुन लो

किसी की राह में काँटे रखना

ये माना वो शजर सूखा बहुत है

मगर उस में अभी साया बहुत है

पड़ोसी के मकाँ में छत नहीं है

मकाँ अपने बहुत ऊँचे रखना

मिरे ऐबों को गिनवाया तो सब ने

किसी ने मेरी ग़म-ख़्वारी नहीं की

देर तक मिल के रोते रहे राह में

उन से बढ़ता हुआ फ़ासला और मैं

फ़रिश्तों में भी जिस के तज़्किरे हैं

वो तेरे शहर में रुस्वा बहुत है

हम को ख़बर है शहर में उस के संग-ए-मलामत मिलते हैं

फिर भी उस के शहर में जाना कितना अच्छा लगता है

ख़ता मैं ने कोई भारी नहीं की

अमीर-ए-शहर से यारी नहीं की

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Jashn-e-Rekhta | 8-9-10 December 2023 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate - New Delhi

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