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ज़फ़र मुरादाबादी

1951 | दिल्ली, भारत

ख़ुश-गुमाँ हर आसरा बे-आसरा साबित हुआ

ज़िंदगी तुझ से तअल्लुक़ खोखला साबित हुआ

कारवाँ से जो भी बिछड़ा गर्द-ए-सहरा हो गया

टूट कर पत्ते कब अपनी शाख़ पर वापस हुए

यूँही किसी की कोई बंदगी नहीं करता

बुतों के चेहरों पे तेवर ख़ुदा के रक्खे थे

मिरी उम्मीद का सूरज कि तेरी आस का चाँद

दिए तमाम ही रुख़ पर हवा के रक्खे थे

क्या ख़बर किस मोड़ पर बिखरे मता-ए-एहतियात

पत्थरों के शहर में हूँ आईना ओढ़े हुए

बढ़े कुछ और किसी इल्तिजा से कम हुए

मिरे हरीफ़ तुम्हारी दुआ से कम हुए

तमाम फूल महकने लगे हैं खिल खिल कर

चमन में शोख़ी-ए-बाद-ए-सबा को छूते ही